जब मुस्लिम दुनिया में कहीं भी अत्याचार होता है – जैसे ग़ज़ा, यमन, सीरिया या अब इजराइल-ईरान के बीच – तो सबसे ज्यादा बेचैनी मुस्लिम युवाओं को होती है। वे सोचते हैं कि हम क्या करें? सिर्फ खबरें पढ़ना या गुस्सा करना काफी नहीं है।
असल में, मुस्लिम युवा बहुत कुछ कर सकते हैं। सबसे पहले — दुआ करें, लेकिन साथ-साथ सोशल मीडिया पर इंसाफ और अमन की बात फैलाएं। झूठी खबरों से बचें और दूसरों को भी सिखाएं कि किस तरह सही जानकारी शेयर की जाए।
दूसरा — आर्थिक, सामाजिक या मीडिया के ज़रिए अपनी ताक़त बढ़ाएं। जैसे कि एक मज़बूत मुस्लिम मीडिया प्लेटफॉर्म खड़ा करना, जहां उम्मत की बात सही अंदाज़ में दुनिया तक पहुंचे। तीसरा — शांति, शिक्षा और एकता की बात करें। किसी मज़हब या कौम के खिलाफ ज़हर फैलाने से सिर्फ फूट बढ़ेगी।
याद रखिए — एक सोच, एक कलम, एक सोशल पोस्ट भी बहुत बड़ा असर पैदा कर सकती है। उम्मत की बेहतरी की शुरुआत हमारे हाथों से हो सकती है।