इजराइल और ईरान के टकराव में मीडिया की भूमिका बहुत अहम है। पश्चिमी मीडिया अक्सर इजराइल के पक्ष में खबरें दिखाता है, जबकि ईरानी मीडिया अपने एजेंडे को बढ़ावा देता है। ऐसे में एक आम मुसलमान को यह समझना बहुत ज़रूरी है कि कौन सी खबर सच्ची है और कौन सी प्रोपेगंडा है।
सोशल मीडिया पर भी अफवाहें, झूठी तस्वीरें और एकतरफा बातें वायरल होती हैं। इस कारण लोगों की सोच भ्रमित हो जाती है। कुछ लोग इजराइल को पूरी तरह सही मानते हैं, तो कुछ ईरान को। लेकिन हकीकत यह है कि इस लड़ाई का सबसे बड़ा नुकसान आम इंसानों को होता है — खासकर फिलिस्तीनी बच्चों, और आम मुसलमानों को।
हमें जिम्मेदारी से मीडिया देखना चाहिए। भरोसेमंद मुस्लिम चैनल्स, स्वतंत्र पत्रकारों और जमीन से जुड़ी रिपोर्टिंग को प्राथमिकता देनी चाहिए। साथ ही खुद भी रिसर्च करनी चाहिए, ताकि सच्चाई की पहचान हो सके।
मीडिया एक हथियार भी हो सकता है — और इंसाफ की आवाज भी। फैसला आपको करना है कि आप किसकी बात सुनते हैं।