जब भी इजराइल और ईरान के बीच तनाव बढ़ता है, तो मुस्लिम जनता का सबसे पहला सवाल होता है – बाकी मुस्लिम देश चुप क्यों हैं? क्या मुस्लिम उम्मत एकजुट नहीं हो सकती? क्या उम्मत को सिर्फ बयानबाज़ी से संतोष करना चाहिए?
हकीकत यह है कि मुस्लिम दुनिया कई धड़ों में बंटी हुई है। सऊदी अरब और ईरान की आपसी तनातनी, तुर्की का अलग एजेंडा, मिस्र की चुप्पी — सब मिलकर उम्मत की ताक़त को कमज़ोर कर देते हैं। इस्लामी सहयोग संगठन (OIC) भी सिर्फ बयान देने तक सीमित रह गया है।
हालात इतने गंभीर हैं कि ग़ज़ा में बच्चों की मौत पर भी कई मुस्लिम देश “राजनीतिक संतुलन” बनाए रखने की कोशिश करते हैं। लेकिन सवाल उठता है – क्या यह संतुलन इंसाफ से ज़्यादा ज़रूरी है?
यह वक्त है कि मुस्लिम जनता अपने हुक्मरानों से जवाब मांगे। सोशल मीडिया पर आवाज़ उठाएं, दुआ करें और सच की तरफ खड़े हों। क्योंकि खामोशी भी एक किस्म की बेबसी होती है – और बेबसी ज़ुल्म को बढ़ावा देती है।