इजराइल और ईरान के बीच तनातनी कोई नई बात नहीं है। यह दशकों पुराना विवाद है, जिसकी जड़ें राजनीति, धर्म और क्षेत्रीय प्रभुत्व से जुड़ी हैं। 1979 की ईरानी इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान ने इजराइल को एक “अवैध राष्ट्र” मानना शुरू किया। वहीं इजराइल ने ईरान को अपनी सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया।
ईरान खुलेआम फिलिस्तीन का समर्थन करता है, खासकर हमास और हिजबुल्लाह जैसे संगठनों को। इजराइल का आरोप है कि ये संगठन उसके नागरिकों पर हमले करते हैं, और इनका समर्थन ईरान करता है। हाल ही में ग़ज़ा और वेस्ट बैंक में इजराइली कार्रवाईयों के चलते मुस्लिम दुनिया में नाराज़गी फैली है, और ईरान का रुख और कठोर हो गया है।
ईरान ने इजराइल को चेतावनी दी है कि अगर वह मुस्लिम इलाकों पर ज़ुल्म करता रहेगा, तो उसका जवाब सैन्य तौर पर दिया जाएगा। वहीं इजराइल भी लगातार सीरिया में ईरानी मिलिशिया पर हमले करता रहा है। इस पूरे विवाद का असर सिर्फ इन दो देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी मुस्लिम दुनिया इससे प्रभावित हो रही है।
यह समय है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुलह और इंसाफ की बात हो। मुस्लिम उम्मत को भी एकजुट होकर अमन की आवाज बुलंद करनी चाहिए।